Wednesday, 8 July 2020

गीता का पाठ







चेन्नई में समुद्र के किनारे एक सज्जन धोती कुर्ता में भगवद गीता पढ़ रहे थे।

तभी वहां एक लड़का आया और बोला कि आज साइंस का जमाना है...

फिर भी आप लोग ऐसी किताबें पढ़ते हो...
देखिए जमाना चांद पर पहुंच गया है...
और आप लोग ये गीता रामायण पर ही अटके हुए हो.....

उन सज्जन ने लड़के से पूंछा की "तुम गीता के बारे में क्या जानते हो"

वो लड़का जोश में आकर बोला-- अरे बकवास....मैं विक्रम साराभाई रीसर्च संस्थान का छात्र हूं...I m a scientist....ये गीता तो बकवास है हमारे आगे

वो सज्जन हंसने लगे....तभी दो बड़ी बड़ी गाड़िया वहां आयी...

एक गाड़ी से कुछ ब्लैक कमांडो निकले....और एक गाड़ी से एक सैनिक सैनिक ने पीछे का गेट खोला तो वो सज्जन पुरुष चुपचाप गाड़ी में जाकर बैठ गए...

लड़का ये सब देखकर हक्का बक्का था। उसने दौड़कर उनसे पूंछा----सर....सर आप कौन है??

वो सज्जन बोले---तुम जिस विक्रम साराभाई रिसर्च इंस्टीट्यूट में पढ़ते हो मैं वही विक्रम साराभाई हूँ .....

लड़के को 440 वाट का झटका लगा।

इसी भगवद गीता को पढ़कर डॉ अब्दुल कलाम ने आजीवन मांस न खाने की प्रतिज्ञा कर ली थी....

गीता एक महाविज्ञान है.....
गर्व कीजिये

Tuesday, 7 July 2020

बचें अशांति को मिटाने की चेष्टा से





"इस अशुद्धि से भरे संसार में कौन विश्रांति को उपलब्ध होता है?
 जो ठहर कर अशुद्धियों को बह जाने देता है।"

इस संबंध में बुद्ध की एक कहानी मुझे सदा प्रिय रही है, वह मैं आपसे कहूं। यह सूत्र उस पूरी कथा का शीर्षक है।
"हू कैन फाइंड रिपोज इन ए मडी वर्ल्ड? बाई लाइंग स्टिल इट बिकम्स क्लियर।'
बुद्ध एक पहाड़ के पास से गुजरते हैं। धूप है तेज। गर्मी के दिन। उन्हें प्यास लगी। आनंद से उन्होंने कहा, आनंद, तू पीछे लौट कर जा; अभी-अभी हमने एक नाला पार किया है, तू पानी भर ला!
आनंद भिक्षा-पात्र लेकर पीछे गया। कोई दो फर्लांग दूर वह नाला था। जब बुद्ध और आनंद वहां से निकले थे, तो नाला बड़ा स्वच्छ था। जलधार धूप में मोतियों जैसी चमकती थी। छिछला था नाला; कंकड़-पत्थरों पर शोर-गुल की आवाज करता बहता था। पहाड़ी नाला था; स्वच्छ, ताजा जल उसमें था। लेकिन जब आनंद वापस पहुंचा, तो देखा कि कुछ बैलगाड़ियां उसके सामने ही उसमें से गुजर रही हैं और नाला गंदा हो गया। धूल और कीचड़ ऊपर उठ आई। सूखे पत्ते दबे जो जमीन में पड़े थे, वे फैल गए। सारा पानी गंदा हो गया; पीने योग्य न रहा।
आनंद वापस लौटा। आनंद के मन में हुआ: बुद्ध इतने महा ज्ञानी हैं, उन्हें यह भी पता न चला कि जब मैं जाऊंगा, तो दो गाड़ियां वहां से निकल जाएंगी, सब पानी गंदा हो जाएगा! आनंद वापस लौटा और उसने बुद्ध से कहा कि वह पानी गंदा हो गया है। गाड़ियां उस पर से गुजर गईं। अब वह पीने योग्य नहीं है।
तो मैं आगे जाता हूं। तीन मील दूर आगे नदी है; वहां से पानी ले आऊं। बुद्ध ने कहा कि नहीं, पानी तो उसी नाले का मुझे पीना है। तू वापस जा! आनंद को बड़ी कठिनाई हुई कि पहले तो समझ लो कि न जानते हुए बुद्ध ने भेजा था; अब जान कर! आनंद को ठिठकते देख कर बुद्ध ने कहा, तू जा भी!
आनंद फिर गया। लेकिन उस पानी को पीने के योग्य माना नहीं जा सकता था। पानी बिलकुल गंदा था। आनंद बड़ी मुश्किल में पड़ा। उस गंदे पानी को बुद्ध के पीने के लिए लाए भी कैसे? फिर वापस लौटा; बुद्ध से कहा, क्षमा करें, वह पानी लाने योग्य बिलकुल नहीं है।
बुद्ध ने कहा, तू एक बार और मेरी मान और जा! आनंद का मन हुआ कि इनकार कर दे। लेकिन बुद्ध ने इतने अनुनय के स्वर से कहा कि वह फिर वापस लौटा। जाते वक्त बुद्ध ने उससे कहा, *आनंद, और अब लौटना मत। किनारे पर बैठ रहना। जब तक पानी तुझे पीने योग्य न लगे, तब तक बैठे रहना।*
आनंद गया। किनारे पर बैठ गया। बैठ कर देखता रहा, देखता रहा, देखता रहा। थोड़ी देर में सूखे पत्ते बह गए, मिट्टी के कण नीचे बैठ गए, धूल हट गई। पानी पुनः स्वच्छ हो गया। पानी भर कर आनंद नाचता हुआ लौटा।
बुद्ध के चरणों में गिर कर उसने कहा कि तुम्हारी अनुकंपा अपार है! क्या तुमने मुझे उस पानी की धार से कुछ संदेश दिया? मैं नासमझ क्या-क्या सोचता रहा!
मुझे समझ आ गया उस नदी के, उस झरने के किनारे बैठ कर कि यह मन भी ऐसा ही गंदगी से भरा है। क्या मन के किनारे भी हम ऐसे ही बैठ कर प्रतीक्षा करें, तो यह गंदगी बह जाएगी?
बुद्ध ने कहा, इसीलिए तुझे तीन बार मुझे वापस भेजना पड़ा।
लाओत्से का सूत्र उसका शीर्षक है। हू कैन फाइंड रिपोज इन ए मडी वर्ल्ड? *इस मटमैली, गंदी दुनिया में, कीचड़ से भरी दुनिया में, कौन पा सकेगा विश्रांति? बाई लाइंग स्टिल इट बिकम्स क्लियर।*
कुछ और करने की जरूरत नहीं है। इस संसार में प्रतीक्षा से शांत होकर बैठ जाना काफी है। सब स्वच्छ हो जाता है अपने से।
आनंद से बुद्ध ने बाद में पूछा कि आनंद, तुझे कभी ऐसा उस झरने के किनारे नहीं हुआ कि कूद पडूं और साफ कर दूं? आनंद ने कहा, हुआ ही नहीं, मैंने किया भी। लेकिन पानी और भी गंदा हो गया था।
मन के साथ हम भी सब यही करते हैं। कूद कर साफ करने की कोशिश करते हैं। जबर्दस्ती मन को साफ करने की कोशिश करते हैं। हमारी जबर्दस्ती, हमारा झरने में उतर जाना पानी को और गंदा कर जाता है।
इसलिए तथाकथित धार्मिक आदमी जो मंदिरों में बैठ कर ध्यान और पूजा और प्रार्थना करते रहते हैं, कहीं उनके मन में झांकने का आपको अवसर मिले, तो आपको पता चले कि वे मंदिर में जरूर बैठे हैं, मंदिर से उनके मन का कोई भी संबंध नहीं है।
मन उनका इतनी गंदगी से इतना भर गया है जितना कि दुकान पर बैठ कर भी नहीं भरता। क्योंकि दुकान पर भी एक एकाग्रता रहती है धन पर, मंदिर में उतनी एकाग्रता भी नहीं रह जाती। और क्यों नहीं रह जाती?
सभी को यह अनुभव हुआ होगा, जो भी मन को शांत करने की कोशिश करेगा, उसे पता चला होगा कि शांत करने जाओ, तो और अशांत हो जाता है।
क्योंकि शांत करने जाएगा कौन? आप अशांत हैं और आप शांत करने जा रहे हैं! तो अशांति दुगुनी हो जाएगी। बहुगुनी भी हो सकती है। तो अगर कोई बहुत ज्यादा शांत करने की कोशिश करे, तो पहले अशांत था, पीछे विक्षिप्त हो सकता है। फिर रास्ता क्या है?
लाओत्से का रास्ता खयाल में रखने जैसा है। यह परम मार्ग है। लाओत्से कहता है, मन की धारा के पास चुपचाप बैठ जाएं, लाइंग स्टिल, लेट जाएं। बहने दें धार को, होने दें गंदगी; मटमैली है धार, रहने दें। शांत बैठ जाएं, सिर्फ प्रतीक्षा करें। और कुछ न करें। कोशिश न करें शांत करने की।
कौन आदमी इस जगत में शांति को उपलब्ध हो सकता है? वही जो अशांति को मिटाने की चेष्टा से बचे।
यह बहुत अजीब लगेगा--जो अशांति को मिटाने की चेष्टा से बचे। क्योंकि सब अशांति हमारी चेष्टाओं का फल है। और अब हम शांत होने की भी चेष्टा करें, तो हम और गहन अशांति पैदा कर लेंगे।

ताओ उपनिषद--प्रवचन



बदला और बदलाव



#दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति बनने के बाद,
एक बार नेल्सन मंडेला अपने सुरक्षा कर्मियों के साथ एक होटल में खाना खाने गए। सबने अपनी अपनी पसंद का खाना आर्डर किया और खाना आने का इंतजार करने लगे। 

उसी समय मंडेला की सीट के सामने वाली सीट पर एक व्यक्ति अपने खाने का इंतजार कर रहा था। मंडेला ने अपने सुरक्षा कर्मी से कहा कि उसे भी अपनी टेबल पर बुला लो। ऐसा ही हुआ। सभी खाने लगे, वो आदमी भी अपना खाना खाने लगा, पर उसके हाथ खाते हुए कांप रहे थे।

खाना खत्म कर वो आदमी सिर झुका कर होटल से बाहर निकल गया। उस आदमी के जाने के बाद मंडेला के सुरक्षा अधिकारी ने मंडेला से कहा कि वो व्यक्ति शायद बहुत बीमार था, खाते वख़्त उसके हाथ लगातार कांप रहे थे और वह ख़ुद भी कांप रहा था। 

मंडेला ने कहा नहीं ऐसा नहीं है। वह उस जेल का जेलर था, जिसमें मुझे कैद रखा गया था। जब कभी मुझे यातनाएं दी जाती थीं  और मै कराहते हुए पानी मांगता था तो ये मेरे ऊपर पेशाब करता था।

मंडेला ने कहा मै अब राष्ट्रपति बन गया हूं, उसने समझा कि मै भी उसके साथ शायद वैसा ही व्यवहार करूंगा । पर मेरा चरित्र ऐसा नहीं है। मुझे लगता है बदले की भावना से काम करना विनाश की ओर ले जाता है। वहीं धैर्य और सहिष्णुता की मानसिकता हमें विकास की ओर ले जाती है। 

Monday, 6 July 2020

अमृत और जीवन



सिकंदर उस जल की तलाश में था, जिसे पीने से मानव अमर हो जाते हैं.!

काफी दिनों तक  दुनियाँ में भटकने के पश्चात आखिरकार उस ने वह जगह पा ही ली, जहाँ उसे अमृत की प्राप्ति हो

उसके सामने ही अमृत जल बह रहा था, वह अंजलि में अमृत को लेकर पीने के लिए झुका ही था कि तभी एक बूढ़ा व्यक्ति जो उस गुफा के भीतर बैठा था, जोर से बोला,  रुक जा, यह भूल मत करना...!’

बड़ी दुर्गति की अवस्था में था वह बूढ़ा !

सिकंदर ने कहा, ‘तू रोकने वाला कौन...?’

बूढ़े ने उत्तर दिया, ..मैं अमृत की तलाश में था और यह गुफा मुझे भी मिल गई थी !, मैंने यह अमृत पी लिया !
 अब मैं मर नहीं सकता, पर मैं अब मरना चाहता हूँ... !देख लो मेरी हालत...अंधा हो गया हूँ, पैर गल गए हैं,  

देखो...अब मैं चिल्ला रहा हूँ...चीख रहा हूँ...कि कोई मुझे मार डाले, लेकिन मुझे मारा भी नहीं जा सकता !
 अब प्रार्थना कर रहा हूँ  परमात्मा से कि प्रभु मुझे मौत दे !

 सिकंदर  चुपचाप गुफा से बाहर वापस लौट आया, बिना अमृत पिए !

 सिकंदर समझ चुका था कि जीवन का आनन्द
उस समय तक ही रहता है, जब तक हम उस आनन्द को भोगने की स्थिति में होते हैं!

इसलिए स्वास्थ्य की रक्षा कीजिये !
जितना जीवन मिला है,उस जीवन का भरपूर आनन्द लीजिये !
 हमेशा खुश रहिये

दुनियां में सिकंदर कोई नहीं, वक्त ही सिकंदर है..



जीवन अनमोल है ....कड़वा है किंतु यही सत्य है !

Lockdown में छूट सरकार ने दी है, कोरोना ने नही...
सरकार ने तो
लॉकडाउन खोल दिया
लेकिन आप सावधान रहिये, क्योंकि आप सरकार कि नजर में मात्र एक संख्या हैं
लेकिन अपने परिवार के लिये आप पूरी दुनिया हैं !
आपका जीवन अनमोल है !

Be Safe🙌

न्याय




मुल्ज़िम एक पंद्रह साल का लड़का था स्टोर से चोरी करता हुआ पकड़ा गया पकड़े जाने पर गार्ड की गिरफ्त से भागने की कोशिश में स्टोर का एक शेल्फ भी टूट गया
जज ने जुर्म सुना और लड़के से पूछा
तुमने क्या सचमुच कुछ चुराया था ब्रैड और पनीर का पैकेट लड़के ने नीचे नज़रें कर के जवाब दिया
क्यों ? 
मुझे ज़रूरत थी
खरीद लेते :-- जज
पैसे नहीं थे :-- लड़का 
घर वालों से ले लेते 
घर में सिर्फ मां है बीमार है बेरोज़गार भी उसी के लिए चुराई थी।
तुम कुछ काम नहीं करते ? 
करता था एक कार वाश में मां की देखभाल के लिए एक दिन की छुट्टी की थी तो मुझ निकाल दिया गया।
तुम किसी से मदद मांग लेते। 
सुबह से घर से निकला था तकरीबन पचास लोगों के पास गया बिल्कुल आख़री में ये क़दम उठाया।

जिरह ख़त्म हुई जज ने फैसला सुनाना शुरू किया :-

चोरी और ख़ुसूसन ब्रैड की चोरी बोहोत होल्नाक जुर्म है और इस जुर्म के हम सब ज़िम्मेदार हैं अदालत में मौजूद हर शख़्स मुझ समेत हम सब मुजरिम हैं इसलिए यहाँ मौजूद हर शख़्स पर दस-दस डालर का जुर्माना लगाया जाता है, दस डालर दिए बग़ैर कोई भी यंहा से बाहर नहीं निकल सकेगा।
ये कह कर जज ने दस डालर अपनी जेब से बाहर निकाल कर रख दिए और फिर पेन उठाया लिखना शुरू किया:-
इसके अलावा में स्टोर पर एक हज़ार डालर का जुर्माना करता हूं कि उसने एक भूखे बच्चे से ग़ैर इंसानी सुलूक करते हुए पुलिस के हवाले करा अगर चौबीस घंटे में जुर्माना जमा नहीं करा तो कोर्ट स्टोर सील करने का हुक्म दे देगी।
जुर्माना की पूर्ण राशि इस लड़के को देकर कोर्ट ने उस लड़के से माफी तलब करती है। 
फैसला सुनने के बाद कोर्ट में मौजूद लोगों के आंखों से आंसू तो बरस ही रहे थे उस लड़के के भी हिचकीया बंध गई।वो लड़का बार बार जज को देख रहा था जो अपने आंसू छिपाते हुए बाहर निकल गया।
ऐसे होते हैं ईमानदार जज।क्या हमारे देश में आज तक ऐसा कोई निर्णय दिया होगा।
हमारे देश में तो 20-20 और 25-25 वर्ष पश्चात जब कोई इन्सान बेकसूर सिद्ध होता है उसको उसको सिर्फ और सिर्फ माननीय न्यायालय बाइज्ज़त बरी कर देती है।

Sunday, 5 July 2020

#हमारे_कर्म_फल



 एक बार एक बिल्डर ने अपने मैनेजर को एक बार इतना डाटा कि मैनेजर को बहुत गुस्सा आया !
 पर बिल्डर को कुछ बोल ना सका...
 वह अपना गुस्सा किस पर निकाले ? गया सीधा अपने कंपनी स्टाफ के पास और सारा गुस्सा कर्मचारियों पर निकाल दिया।
अब कर्मचारी किस पर अपना गुस्सा निकाले ? तो जाते-जाते अपने गेट वॉचमैन पर उतारते गए !
अब वॉचमैन ने किस पर निकाला अपना गुस्सा ?
तो वह घर गया और अपनी बीवी को डांटने लगा बिना किसी बात पर। वह भी उठी और अपने बच्चे की पीठ पर 2 धमाक धमाक लगा दिया - सारा दिन tv देखता रहता है काम कुछ करता नहीं है !!
अब बच्चा घर से गुस्से से निकला, और  सड़क पर सो रहे कुत्ते को पत्थर दे मारा,
कुत्ता हड़बड़ाकर भागा और सोचने लगा कि इसका मैंने क्या बिगाड़ा-और गुस्से में उस कुत्ते ने एक आदमी को काट खाया-
और कुत्ते ने जिसे काटा...पता है वह आदमी कौन था ???
ये वही बिल्डर साहब थे,  जिन्होंने अपने मैनेजर को डांटा था...!!!

और वह बिल्डर जब तक जिए तब तक यही सोचता रहा कि उस कुत्ते ने आखिर मुझे क्यों काटा ?
लेकिन बीज किसने बोया ?

आया कुछ समझ में--  *कर्म के फल पीछा नहीं छोड़ते बाबा*  जाने अनजाने में कितने लोग हमारे व्यवहार से त्रस्त होते हैं,    परेशान होते हैं और कितने का तो नुकसान भी होता है।

पर हमें तो उसका अंदाजा भी नहीं होता, क्योंकि हम तो अपनी मस्ती में ही मस्त है।
पर  प्रकृति सब देखती है और उसका फल फिर किसी और के निमित्त से हमें मिलता है,  और हमें लगता है कि लोग हमें बेवजह ही परेशान कर रहे हैं*?
 🙏🌻