Saturday, 18 July 2020

इस लॉकडाउन में सकारात्मकता


लॉकडाउन में घरों में बंद रहने के कारण और कोरोना से संबंधित दुःखद खबरें देख-पढ़ कर ज्यादातर लोग अवसादग्रस्त हो रहे हैं। गुस्सा, चिड़चिड़ापन की शिकायतें आ रही हैं। ऐसी दशा में कुछ लोग आत्मघाती कदम भी उठा लेते हैं और अपने पूरे परिवार को तबाह कर लेते हैं। यह सब सकारात्मक वातावरण के अभाव में हो रहा है। यदि हम सकारात्मक वातावरण में रहें और सकारात्मक वातावरण न होने पर् उसका निर्माण कर् लें तो ऐसी दुखद घटनाओं को होने से रोका जा सकता है या कम किया जा सकता है।


माहौल का बहुत फर्क पडता है। जब हम किसी की शवयात्रा के दौरान शमशान घाट पर होते हैं तो संसार से विरक्ति, जीवन के प्रति निराशा के भाव मन में आने लगते हैं। यदि हम अस्पताल में किसी मरीज़ को देखने जाते हैं तो वहां का माहौल देख कर मन दुखी होने लगता है, ऐसा महसूस होता है जैसे संसार में दुख ही दुख है और कोई भी सुखी नहीं हैं| यदि हम जेल, कचहरी या अदालत में जाते हैं तो प्रतीत होता है कि दुनिया अपराधियों से भरी पडी है। ऐसे ही यदि हम किसी शादी समारोह में या किसी होटल में किसी कार्यक्रम में होते हैं तो सारे दुखों को भूल कर नाचने लगते हैं, ऐसा लगता है जैसे चारों ओर सुख ही सुख है। यह सब माहौल का ही असर होताहै।


सकारात्मक माहौल का कितना फर्क पडता है इसके अनेक उदाहरण हैं। हाथी और घोडी की कहानियाँ आपने पहले भी सुनी ही होंगीं, परंतु माहौल पर हो रही चर्चा के संदर्भ में वो प्रकरण समीचीन हैं और उनका यहाँ वर्णन प्रासंगिक ही होगा।


एक राजा की सेना का हाथी दलदल में गिर गय । बहुत कोशिश के उपरांत भी बाहर नहीं निकाला जा सका तो राज पंडित से उपाय करने को कहा गया। राजपंडित ने कहा “जैसे माहौल में हाथी रहता था वैसा ही माहौल बनाइये, देखिये हाथी तुरंत बाहर आ जायेगा।” ऐसा ही किया गया| चूंकि वह सेना का हाथी था, इस लिये युद्ध का माहौल बनाया गया। दुंदुभी बजाई गई, ढोल नगाडे वाले बुलाये, सैनिकों की पद्चाल कराई गई। हाथी को लगा कि युद्ध होने वाला है, सैनिक आ रहे हैं, सेनापति मेरा इंतज़ार कर रहे होंगे। उसमें अतिरिक्त जोश का संचार हो गया। उसने बाहर आने के लिये अपनी ओर से भी जोर लगाया और बाहर आ गया।



घोडी वाला प्रकरण भी व्यंग्य के रूप में काफी प्रचलित है कि ताँगेवाला घोडी के आगे थोडी थोडी देर बाद नाचता था तभी वो आगे चलती थी। ताँगे वाले से जब इसका कारण पूछा गया तो बोला कि ये बारात के दूल्हे की घोडी है, इसके सामने बारात का माहौल बनाना पड्ता है, तभी यह चलती है,आगे बढ़ती है। यद्यपि यह व्यंग्य है, परंतु इसमें जो संदेश छिपा है वो यही है कि माहौल का बहुत ज्यादा असर होता है।

तृप्ति

तुम और ज्यादा करना चाहते हो, और ज्यादा करना चाहते हो। कितना ही मिल जाए, तृप्ति नहीं होती।

सुना है मैंने, मुल्ला नसरुद्दीन नियाग्रा जलप्रपात देखने गया। शिकायती आदमी है; अहोभाव मुश्किल है। किसी चीज को देख कर तृप्त होना असंभव है। किसी चीज को देख कर प्रसन्न होना मुश्किल है। खड़ा है नियाग्रा जलप्रपात के पास। जो मार्गदर्शक है, वह प्रशंसा करता है। क्योंकि ऐसा कोई जलप्रपात नहीं, ऐसी अनूठी घटना है नियाग्रा। लेकिन मुल्ला नसरुद्दीन ऐसे खड़ा है जैसे कुछ भी नहीं।

वह मार्गदर्शक कहता है, आप ऐसे खड़े हैं, गौर से तो देखें! यह अनूठी घटना है। कितना जल गिर रहा है, पता है आपको? अरबों-खरबों गैलन प्रति सेकेंड! मुल्ला ने ऐसी नजर डाली और कहा, दिन भर में कितना गिरता है? आंकड़े। उस आदमी ने कहा, मुझे हिसाब नहीं, लेकिन आप अंदाज कर सकते हैं। असंख्य गैलन! और मुल्ला ने कहा, रात भर भी गिरता रहता है? लेकिन उसके मन पर कोई भाव नहीं है। इस विराट घटना के करीब भी वह ऐसे ही खड़ा है जैसे बाथरूम में नल की टोंटी खोल कर खड़ा रहता हो। कोई फर्क नहीं है।

शिकायती को तुम किसी भी क्षण में विराट से नहीं भर सकते। वह विराट की भी नाप-जोख कर लेगा: कितने गैलन दिन में? रात में भी गिरता है? वह विराट को भी माप लेगा।

और जब भी तुम किसी चीज को माप लोगे, तुम्हारा मन कहेगा, इससे बड़ा भी तो हो सकता है। तो इसमें प्रभावित होने का क्या है? पानी ही तो गिर रहा है। कोई सोना तो नहीं बरस रहा। और जितनी भी बड़ी संख्या हो, इससे क्या फर्क पड़ता है। अन्यथा तो एक पानी की बूंद, सुबह दूब पर पड़ी एक ओस, सूरज की चमकती किरणें--और विराट प्रकट हो जाता है। कोई नियाग्रा जाने की जरूरत है? एक बूंद काफी है,अगर अहोभाव हो। अन्यथा नियाग्रा भी काफी नहीं है।

कैसे तुम्हारे भीतर मौत बड़ी होती है?

लाओत्से कहता है, तुम्हारे भीतर मौत बड़ी होती है, क्योंकि तुम उससे तुम तृप्त नहीं हो। लाओत्से यह कह रहा है, अतृप्ति से मौत सघन होती है, बनती है, निर्मित होती है। अतृप्ति मौत है।

इसलिए तो बूढ़े मरते हैं। क्योंकि बूढ़े अतृप्ति के ज्यादा करीब पहुंच जाते हैं बच्चों की बजाय। बच्चे छोटी-छोटी चीजों में तृप्त मालूम होते हैं। एक खिलौना, एक उड़ती तितली काफी है। एक छोटा सा घास में खिला फूल पर्याप्त खजाना है। छोटे बच्चे इतने ताजे और जीवंत हैं, मौत बड़ी दूर है। क्योंकि छोटे-छोटे में, क्षुद्र में भी विराट का दर्शन हो रहा है।

लेकिन यह अज्ञान के कारण हो रहा है। जल्दी ही मौत प्रवेश कर जाएगी। जल्दी ही शिकायत शुरू हो जाएगी। जल्दी ही बच्चा भी कहने लगेगा, और चाहिए। फिर उसका कोई अंत नहीं है।

एक मित्र मेरे पास आते थे। एक राज्य में शिक्षा मंत्री हैं। उन्होंने मुझसे कहा, मुझे नींद नहीं आती। और कहने लगे, न मुझे ईश्वर की खोज है, न मुझे आत्मा जाननी, न मुझे मोक्ष की इच्छा है। मैं आपके पास सिर्फ इसलिए आया हूं कि मुझे सिर्फ नींद आ जाए। यह मेरे जीवन-मरण का प्रश्न है। मैं सब दवाइयां लेकर हार चुका। ट्रैंक्वेलाइजर लेता हूं तो सुस्ती आ जाती है, नींद नहीं आती। उलटा सुबह और भी ज्यादा बेचैन उठता हूं। फिर सुबह मुझे शक्ति पाने के लिए और ताजगी पाने के लिए दूसरी दवाइयां लेनी पड़ती हैं। तो आप इतना ही करें कि मुझे किसी तरह नींद आ जाए। क्या ध्यान से नींद आ सकेगी? और ज्यादा मेरी मांग नहीं है।

जब वे यह बोल रहे थे तो मैंने इशारा किया और उनकी सब बातें टेप कर ली गईं। क्योंकि मैं जानता हूं, राजनीतिज्ञ हैं, इनकी बात का कोई भरोसा नहीं है। यह भी मैं जानता हूं कि जब साधारण आदमी की दौड़ इतनी ज्यादा होती है तो राजनीतिज्ञ की तो और ज्यादा होनी ही चाहिए। वह तो मनुष्यों में सब से ज्यादा पागल मनुष्य है। ये कैसे सिर्फ नींद से राजी हो जाएंगे? मुझे भरोसा नहीं आया।

उनसे ध्यान करने को कहा। उन्होंने मेहनत की। तीन सप्ताह बाद वह आए और कहने लगे कि ठीक है, नींद तो आ गई, लेकिन और कुछ नहीं हुआ। मैंने कहा कि अब आप रुकें। आप भूल गए कि तीन सप्ताह पहले आपने कहा था, यह जीवन-मरण का सवाल है। और आप कहते हुए आए थे कि मुझे सिर्फ नींद चाहिए, और कुछ नहीं चाहिए। और जब नींद आ गई तो आप कह रहे हैं कि और कुछ भी नहीं हुआ; बस नींद आ गई।

जो नींद वर्षों से नहीं आई थी, जो दवाओं से नहीं आई थी, वह आ गई, लेकिन उनके मन में धन्यवाद नहीं है। मैंने टेप लगवाया। सुना, कहने लगे कि हां, ठीक है। थोड़े चौंके, कहने लगे कि नहीं, ऐसी बात नहीं। मेरा मतलब यह था कि जब ध्यान से इतना हो सकता है तो और भी हो सकता है। मैंने कहा कि अब आप सोच लें, क्योंकि जैसे आप आदमी हैं, अगर आपको परमात्मा भी मिल जाए तो आप लौट कर कहेंगे, परमात्मा मिल गया, और कुछ नहीं हुआ। मोक्ष मिल जाए, आप कहेंगे, अब? और कुछ भी न हुआ।

और इस तरह के आदमी को मोक्ष नहीं मिल सकता। यह नींद भी ज्यादा देर न टिकेगी। यह खो जाएगी। क्योंकि आपको नींद लेने की भी पात्रता नहीं है। क्यों गांव-देहात का गरीब आदमी, जिसे एक जून रोटी मिलती है, कभी वह भी नहीं मिलती, गहरी नींद सोता है? क्यों शहर का धनी, सुखी आदमी, जिसके पास सब है, एक झपकी नहीं ले पाता? होना तो उलटा चाहिए कि जिसके पास कुछ नहीं है वह चिंता में सो न सके, और जिसके पास सब है निश्चिंत होकर सो जाए। ऐसा होता नहीं।

कारण कहीं और है। गांव के गरीब आदमी के मन में शिकायत नहीं है। जो है, वह उससे भी तृप्त है। एक जून रोटी मिल गई, वह भी क्या कम है! हो सकता था, वह भी न मिले। वह एक जून रोटी के लिए भी धन्यवाद दे रहा है। उस धन्यवाद से ही उसके मन में विश्राम है। वही विश्राम उसकी प्रगाढ़ निद्रा बन जाता है।

भिखमंगों को सोते देख कर सम्राट ईष्या से भर जाते हैं। तुमने रास्ते पर भिखमंगों को सोते देखा होगा। दिन की भरी दुपहरी में--बाजार चल रहा है, कारें दौड़ रही हैं, शोरगुल मचा है--और कोई आदमी वृक्ष के नीचे मजे से सो रहा है। सड़क की पटरी पर सो रहा है, घुर्राटे की आवाजें ले रहा है। और तुम अपने कक्ष में, जहां कोई आवाज नहीं पहुंचती, जहां कोई शोरगुल नहीं होता, सुखद से सुखद शय्या पर पड़े करवटें बदलते रहते हो। सम्राट ईष्या से भर जाते हैं भिखारी को सोया हुआ देख कर। क्या कारण क्या होगा?
-ओशो !