Sunday, 19 July 2020

समस्या का समाधान





क बार भगवान बुद्ध भिक्षुओं की सभा में एक कपड़े का टुकड़ा लेकर पधारे। बुद्ध अपने आसन पर बैठे और बिना किसी से कुछ कहे उन्होंने कपड़े के उस टुकड़े में कुछ दूरी पर पांच गांठें लगा दीं। यह सब देखकर शिष्य सोच रहे थे कि अब बुद्ध क्या कहेंगे? बुद्ध ने शिष्यों से पूछा, ‘कोई यह बता सकता है कि क्या यह वही कपड़ा है जो गांठ लगने के पहले था?’ सारिपुत्र ने कहा, ‘इसका उत्तर देना कुछ कठिन है। एक तरह से देखें तो कपड़ा वही है। दूसरी दृष्टि से देखें तो पहले इसमें गांठें नहीं लगी थीं, इसलिए यह कपड़ा पहले जैसा नहीं रहा। लेकिन इसकी मूल प्रकृति नहीं बदली है, केवल बाहरी रूप ही बदला है।’

जवाब सुनकर बुद्ध ने सामने रखा कपड़ा उठाया और उसके दोनों सिरों को एक-दूसरे से दूर खींचने लगे। ‘क्या लगता है सारिपुत्र, ऐसे खींचने से क्या मैं इन गांठों को खोल पाऊंगा?’ बुद्ध ने पूछा। ‘नहीं, तथागत। ऐसे तो आप इन गांठों को और भी मजबूत कर देंगे, जिसके बाद ये कभी नहीं खुलेंगीं’, सारिपुत्र ने जवाब दिया। इस पर बुद्ध ने पूछा, ‘तो यह बताओ कि इन्हें खोलने के लिए क्या करें?’ सारिपुत्र ने कहा, ‘तथागत, पहले मुझे पास से देखना होगा कि ये गांठें कैसे लगाई गई हैं? बिना देखे मैं इन्हें खोलने का उपाय नहीं बता सकता।’

इस पर बुद्ध बोले, ‘तुम सत्य कहते हो सारिपुत्र, क्योंकि यही जानना सबसे जरूरी है। मूल सवाल भी यही है। जिस समस्या में तुम फंसे हुए हो, उससे बाहर निकलने के लिए यह जानना जरूरी है कि समस्या कैसे आई और क्यों आई? अगर यह नहीं जानोगे तो संकट और गहरा होगा।’ बुद्ध बोले, ‘विश्व में सब यही कर रहे हैं। वे पूछते हैं कि हम काम, क्रोध, मद, लोभ, जलन जैसी वृत्तियों से बाहर कैसे निकलें, लेकिन वे यह नहीं पूछते कि हम इन वृत्तियों में पड़े कैसे ?’

दूध का धुला


एक बार एक राजा के सैनिक एक चोर को पकड़ के राजा के दरबार में पहुचे ,और राजा से इनाम पाने की लालसा में चोर के कृत्य को बढ़ा-चढ़ा के बताने लगे ।  चोर सोच में पड़ गया कि मैंने तो छोटी सी चोरी की है, जिसकी सज़ा भी छोटी ही होनी चाहिए ।पर अगर ये सैनिक ऐसे ही बढ़ा-चढ़ा के बोलते रहे तो राजा मुझे बहुत बड़ी सज़ा दे देंगे । चोर अभी ये सब सोच ही रहा था कि तभी राजदरबार का समय समाप्त होने की घोषणा हुई और राजा ने चोर के भाग्य का फैसला अगले दिन करने की बात कहते हुए उसको जेलखाने में डालने का आदेश दे दिया ।

रात को जेलखाने में लेटे हुए चोर अपने बचाव की युक्ति सोचता रहा..... बहुत सोचने के बाद उसको अपने बचने की एक किरण नज़र आई ।

सुबह चोर को फिर से राजदरबार में राजा के सामने पेश किया गया । सैनिकों और अन्य गवाहों के नमक मिर्च युक्त बयानों को सुन कर राजा अत्यंत क्रोधित हुआ और उसने उस चोर को १०० कोड़े मारे जाने की सज़ा सुनाई । इस पर चोर ने सज़ा से पहले अपने मन की एक बात राजदरबार में कहने की अनुमति मांगी । राजा ने अनुमति दे दी ....

तब चोर ने कहा कि पिछली रात मैंने एक स्वप्न देखा जिसमे एक महात्मा जी मुझे एक जड़ी बूटी देते हैं और कहते हैं कि इसके सेवन से मुझे एक ऐसी शक्ति प्राप्त होगी जिससे कोई मेरा अहित नहीं कर पायेगा, मुझे मात्र वही व्यक्ति नुकसान पंहुचा पाएगा जो स्वयं पूर्ण रूप से पवित्र होगा... और जिसमे कोई बुराई न हो..... इतना कहकर चोर ने अपनी जेब से जड़ीबूटी का एक टुकड़ा निकाला और राजा को दिखाकर बोला कि यह वही जड़ीबूटी है जो स्वप्न के बाद मुझे जेलखाने में पड़ी मिली और इसका एक टुकड़ा मैं खा भी चुका हूँ !!

चोर के हाथ में पहले से ही कहीं से चुराई हुई जड़ीबूटी का आधा हिस्सा देखकर राजा को लगा कि चोर सच बोल रहा है.......और वो सोच में पड़ गया. ।

राजा को विचारमग्न देखकर चोर ने आगे कहा कि,  मेरे इस स्वप्न का अर्थ यह हुआ कि मेरे द्वारा इस जड़ीबूटी का सेवन करने के बाद अब वही व्यक्ति मुझे कोड़े मार सकता है जो स्वयं पवित्र हो.. अर्थात जिसने स्वयं कभी चोरी न की हो ।

इतना सुनकर राजदरबार में ख़ामोशी छा गई और सभी एक दूसरे का मुंह देखने लगे ! 
कुछ देर बाद राजा ने अपने सिपहसालार से कहा कि तुम कोड़े मारना शुरू करो तो सिपहसालार बोला महाराज मैंने बचपन में अपने पिता जी की कुछ मुद्राएं चुराई थीं अतः मैं इसे कोड़े नहीं मार सकता...

फिर राजा ने अपने सेनापति से कोड़े मारने को कहा तो वो बोला महाराज मैंने भी बचपन में खेल खेल में कुछ अस्त्र चुराए थे अभ्यास के लिए, अतः मै भी इसे कोड़े नहीं मार सकता....


फिर राजा ने अपने मंत्री को आज्ञा दी कि वो चोर को कोड़े मारे..... पर मंत्री ने भी बचपन में कोई खिलौना चुराने की बात स्वीकारते हुए चोर को कोड़े मारने से इंकार कर दिया ।

इसके बाद राजा ने एक एक करके सभी दरबारियों और प्रजाजनों से चोर को कोड़े मारने के लिए कहा पर सभी ने कभी ना कभो कोई चोरी करने की बात स्वीकारते हुए कोड़े मारने से मन कर दिया ।

इस पर मंत्री ने राजा से कहा की महाराज अब तो आपको ही यह कार्य करना पड़ेगा.... आप ही इस चोर को १०० कोड़े मार कर इसे सज़ा दें........... मंत्री की यह बात सुनकर राजा सोच में पड़ गए और धीरे से मंत्री से बोले कि मैंने भी बचपन में एक बाग़ से आम चुराकर खाए थे अतः मैं भी इसे कोड़े नहीं मार सकता !!!

इतना सुनकर चोर ने बड़ी विनम्रता से हाथ जोड़कर राजा से कहा....... कि हे राजन जब इस दरबार में उपस्थित सभी गणमान्य एवं सुसंस्कृत व्यक्तियों ने चोरियां की हैं...... अर्थात सभी एक प्रकार से चोर हैं....... तो सज़ा सिर्फ मुझे ही क्यूँ ?

चोर के इस प्रश्न से सारे दरबार में एक सन्नाटा छा गया...........

...........................कथा-समाप्त.....................
हालांकि कहानी थोङी अटपटी लग सकती है लेकिन बात तो ठीक ही है,....... जब कोई दूध का धुला नहीं है ... तो सब एक दूसरे पर कीचड़ क्यूँ उछालते हैं.?

"सबने मन के आंगने, झूठ रखा संजोय,
मुझको झूठा वो कहे, जो खुद सांचा होय"


Saturday, 18 July 2020

इस लॉकडाउन में सकारात्मकता


लॉकडाउन में घरों में बंद रहने के कारण और कोरोना से संबंधित दुःखद खबरें देख-पढ़ कर ज्यादातर लोग अवसादग्रस्त हो रहे हैं। गुस्सा, चिड़चिड़ापन की शिकायतें आ रही हैं। ऐसी दशा में कुछ लोग आत्मघाती कदम भी उठा लेते हैं और अपने पूरे परिवार को तबाह कर लेते हैं। यह सब सकारात्मक वातावरण के अभाव में हो रहा है। यदि हम सकारात्मक वातावरण में रहें और सकारात्मक वातावरण न होने पर् उसका निर्माण कर् लें तो ऐसी दुखद घटनाओं को होने से रोका जा सकता है या कम किया जा सकता है।


माहौल का बहुत फर्क पडता है। जब हम किसी की शवयात्रा के दौरान शमशान घाट पर होते हैं तो संसार से विरक्ति, जीवन के प्रति निराशा के भाव मन में आने लगते हैं। यदि हम अस्पताल में किसी मरीज़ को देखने जाते हैं तो वहां का माहौल देख कर मन दुखी होने लगता है, ऐसा महसूस होता है जैसे संसार में दुख ही दुख है और कोई भी सुखी नहीं हैं| यदि हम जेल, कचहरी या अदालत में जाते हैं तो प्रतीत होता है कि दुनिया अपराधियों से भरी पडी है। ऐसे ही यदि हम किसी शादी समारोह में या किसी होटल में किसी कार्यक्रम में होते हैं तो सारे दुखों को भूल कर नाचने लगते हैं, ऐसा लगता है जैसे चारों ओर सुख ही सुख है। यह सब माहौल का ही असर होताहै।


सकारात्मक माहौल का कितना फर्क पडता है इसके अनेक उदाहरण हैं। हाथी और घोडी की कहानियाँ आपने पहले भी सुनी ही होंगीं, परंतु माहौल पर हो रही चर्चा के संदर्भ में वो प्रकरण समीचीन हैं और उनका यहाँ वर्णन प्रासंगिक ही होगा।


एक राजा की सेना का हाथी दलदल में गिर गय । बहुत कोशिश के उपरांत भी बाहर नहीं निकाला जा सका तो राज पंडित से उपाय करने को कहा गया। राजपंडित ने कहा “जैसे माहौल में हाथी रहता था वैसा ही माहौल बनाइये, देखिये हाथी तुरंत बाहर आ जायेगा।” ऐसा ही किया गया| चूंकि वह सेना का हाथी था, इस लिये युद्ध का माहौल बनाया गया। दुंदुभी बजाई गई, ढोल नगाडे वाले बुलाये, सैनिकों की पद्चाल कराई गई। हाथी को लगा कि युद्ध होने वाला है, सैनिक आ रहे हैं, सेनापति मेरा इंतज़ार कर रहे होंगे। उसमें अतिरिक्त जोश का संचार हो गया। उसने बाहर आने के लिये अपनी ओर से भी जोर लगाया और बाहर आ गया।



घोडी वाला प्रकरण भी व्यंग्य के रूप में काफी प्रचलित है कि ताँगेवाला घोडी के आगे थोडी थोडी देर बाद नाचता था तभी वो आगे चलती थी। ताँगे वाले से जब इसका कारण पूछा गया तो बोला कि ये बारात के दूल्हे की घोडी है, इसके सामने बारात का माहौल बनाना पड्ता है, तभी यह चलती है,आगे बढ़ती है। यद्यपि यह व्यंग्य है, परंतु इसमें जो संदेश छिपा है वो यही है कि माहौल का बहुत ज्यादा असर होता है।

तृप्ति

तुम और ज्यादा करना चाहते हो, और ज्यादा करना चाहते हो। कितना ही मिल जाए, तृप्ति नहीं होती।

सुना है मैंने, मुल्ला नसरुद्दीन नियाग्रा जलप्रपात देखने गया। शिकायती आदमी है; अहोभाव मुश्किल है। किसी चीज को देख कर तृप्त होना असंभव है। किसी चीज को देख कर प्रसन्न होना मुश्किल है। खड़ा है नियाग्रा जलप्रपात के पास। जो मार्गदर्शक है, वह प्रशंसा करता है। क्योंकि ऐसा कोई जलप्रपात नहीं, ऐसी अनूठी घटना है नियाग्रा। लेकिन मुल्ला नसरुद्दीन ऐसे खड़ा है जैसे कुछ भी नहीं।

वह मार्गदर्शक कहता है, आप ऐसे खड़े हैं, गौर से तो देखें! यह अनूठी घटना है। कितना जल गिर रहा है, पता है आपको? अरबों-खरबों गैलन प्रति सेकेंड! मुल्ला ने ऐसी नजर डाली और कहा, दिन भर में कितना गिरता है? आंकड़े। उस आदमी ने कहा, मुझे हिसाब नहीं, लेकिन आप अंदाज कर सकते हैं। असंख्य गैलन! और मुल्ला ने कहा, रात भर भी गिरता रहता है? लेकिन उसके मन पर कोई भाव नहीं है। इस विराट घटना के करीब भी वह ऐसे ही खड़ा है जैसे बाथरूम में नल की टोंटी खोल कर खड़ा रहता हो। कोई फर्क नहीं है।

शिकायती को तुम किसी भी क्षण में विराट से नहीं भर सकते। वह विराट की भी नाप-जोख कर लेगा: कितने गैलन दिन में? रात में भी गिरता है? वह विराट को भी माप लेगा।

और जब भी तुम किसी चीज को माप लोगे, तुम्हारा मन कहेगा, इससे बड़ा भी तो हो सकता है। तो इसमें प्रभावित होने का क्या है? पानी ही तो गिर रहा है। कोई सोना तो नहीं बरस रहा। और जितनी भी बड़ी संख्या हो, इससे क्या फर्क पड़ता है। अन्यथा तो एक पानी की बूंद, सुबह दूब पर पड़ी एक ओस, सूरज की चमकती किरणें--और विराट प्रकट हो जाता है। कोई नियाग्रा जाने की जरूरत है? एक बूंद काफी है,अगर अहोभाव हो। अन्यथा नियाग्रा भी काफी नहीं है।

कैसे तुम्हारे भीतर मौत बड़ी होती है?

लाओत्से कहता है, तुम्हारे भीतर मौत बड़ी होती है, क्योंकि तुम उससे तुम तृप्त नहीं हो। लाओत्से यह कह रहा है, अतृप्ति से मौत सघन होती है, बनती है, निर्मित होती है। अतृप्ति मौत है।

इसलिए तो बूढ़े मरते हैं। क्योंकि बूढ़े अतृप्ति के ज्यादा करीब पहुंच जाते हैं बच्चों की बजाय। बच्चे छोटी-छोटी चीजों में तृप्त मालूम होते हैं। एक खिलौना, एक उड़ती तितली काफी है। एक छोटा सा घास में खिला फूल पर्याप्त खजाना है। छोटे बच्चे इतने ताजे और जीवंत हैं, मौत बड़ी दूर है। क्योंकि छोटे-छोटे में, क्षुद्र में भी विराट का दर्शन हो रहा है।

लेकिन यह अज्ञान के कारण हो रहा है। जल्दी ही मौत प्रवेश कर जाएगी। जल्दी ही शिकायत शुरू हो जाएगी। जल्दी ही बच्चा भी कहने लगेगा, और चाहिए। फिर उसका कोई अंत नहीं है।

एक मित्र मेरे पास आते थे। एक राज्य में शिक्षा मंत्री हैं। उन्होंने मुझसे कहा, मुझे नींद नहीं आती। और कहने लगे, न मुझे ईश्वर की खोज है, न मुझे आत्मा जाननी, न मुझे मोक्ष की इच्छा है। मैं आपके पास सिर्फ इसलिए आया हूं कि मुझे सिर्फ नींद आ जाए। यह मेरे जीवन-मरण का प्रश्न है। मैं सब दवाइयां लेकर हार चुका। ट्रैंक्वेलाइजर लेता हूं तो सुस्ती आ जाती है, नींद नहीं आती। उलटा सुबह और भी ज्यादा बेचैन उठता हूं। फिर सुबह मुझे शक्ति पाने के लिए और ताजगी पाने के लिए दूसरी दवाइयां लेनी पड़ती हैं। तो आप इतना ही करें कि मुझे किसी तरह नींद आ जाए। क्या ध्यान से नींद आ सकेगी? और ज्यादा मेरी मांग नहीं है।

जब वे यह बोल रहे थे तो मैंने इशारा किया और उनकी सब बातें टेप कर ली गईं। क्योंकि मैं जानता हूं, राजनीतिज्ञ हैं, इनकी बात का कोई भरोसा नहीं है। यह भी मैं जानता हूं कि जब साधारण आदमी की दौड़ इतनी ज्यादा होती है तो राजनीतिज्ञ की तो और ज्यादा होनी ही चाहिए। वह तो मनुष्यों में सब से ज्यादा पागल मनुष्य है। ये कैसे सिर्फ नींद से राजी हो जाएंगे? मुझे भरोसा नहीं आया।

उनसे ध्यान करने को कहा। उन्होंने मेहनत की। तीन सप्ताह बाद वह आए और कहने लगे कि ठीक है, नींद तो आ गई, लेकिन और कुछ नहीं हुआ। मैंने कहा कि अब आप रुकें। आप भूल गए कि तीन सप्ताह पहले आपने कहा था, यह जीवन-मरण का सवाल है। और आप कहते हुए आए थे कि मुझे सिर्फ नींद चाहिए, और कुछ नहीं चाहिए। और जब नींद आ गई तो आप कह रहे हैं कि और कुछ भी नहीं हुआ; बस नींद आ गई।

जो नींद वर्षों से नहीं आई थी, जो दवाओं से नहीं आई थी, वह आ गई, लेकिन उनके मन में धन्यवाद नहीं है। मैंने टेप लगवाया। सुना, कहने लगे कि हां, ठीक है। थोड़े चौंके, कहने लगे कि नहीं, ऐसी बात नहीं। मेरा मतलब यह था कि जब ध्यान से इतना हो सकता है तो और भी हो सकता है। मैंने कहा कि अब आप सोच लें, क्योंकि जैसे आप आदमी हैं, अगर आपको परमात्मा भी मिल जाए तो आप लौट कर कहेंगे, परमात्मा मिल गया, और कुछ नहीं हुआ। मोक्ष मिल जाए, आप कहेंगे, अब? और कुछ भी न हुआ।

और इस तरह के आदमी को मोक्ष नहीं मिल सकता। यह नींद भी ज्यादा देर न टिकेगी। यह खो जाएगी। क्योंकि आपको नींद लेने की भी पात्रता नहीं है। क्यों गांव-देहात का गरीब आदमी, जिसे एक जून रोटी मिलती है, कभी वह भी नहीं मिलती, गहरी नींद सोता है? क्यों शहर का धनी, सुखी आदमी, जिसके पास सब है, एक झपकी नहीं ले पाता? होना तो उलटा चाहिए कि जिसके पास कुछ नहीं है वह चिंता में सो न सके, और जिसके पास सब है निश्चिंत होकर सो जाए। ऐसा होता नहीं।

कारण कहीं और है। गांव के गरीब आदमी के मन में शिकायत नहीं है। जो है, वह उससे भी तृप्त है। एक जून रोटी मिल गई, वह भी क्या कम है! हो सकता था, वह भी न मिले। वह एक जून रोटी के लिए भी धन्यवाद दे रहा है। उस धन्यवाद से ही उसके मन में विश्राम है। वही विश्राम उसकी प्रगाढ़ निद्रा बन जाता है।

भिखमंगों को सोते देख कर सम्राट ईष्या से भर जाते हैं। तुमने रास्ते पर भिखमंगों को सोते देखा होगा। दिन की भरी दुपहरी में--बाजार चल रहा है, कारें दौड़ रही हैं, शोरगुल मचा है--और कोई आदमी वृक्ष के नीचे मजे से सो रहा है। सड़क की पटरी पर सो रहा है, घुर्राटे की आवाजें ले रहा है। और तुम अपने कक्ष में, जहां कोई आवाज नहीं पहुंचती, जहां कोई शोरगुल नहीं होता, सुखद से सुखद शय्या पर पड़े करवटें बदलते रहते हो। सम्राट ईष्या से भर जाते हैं भिखारी को सोया हुआ देख कर। क्या कारण क्या होगा?
-ओशो !

Wednesday, 8 July 2020

गीता का पाठ







चेन्नई में समुद्र के किनारे एक सज्जन धोती कुर्ता में भगवद गीता पढ़ रहे थे।

तभी वहां एक लड़का आया और बोला कि आज साइंस का जमाना है...

फिर भी आप लोग ऐसी किताबें पढ़ते हो...
देखिए जमाना चांद पर पहुंच गया है...
और आप लोग ये गीता रामायण पर ही अटके हुए हो.....

उन सज्जन ने लड़के से पूंछा की "तुम गीता के बारे में क्या जानते हो"

वो लड़का जोश में आकर बोला-- अरे बकवास....मैं विक्रम साराभाई रीसर्च संस्थान का छात्र हूं...I m a scientist....ये गीता तो बकवास है हमारे आगे

वो सज्जन हंसने लगे....तभी दो बड़ी बड़ी गाड़िया वहां आयी...

एक गाड़ी से कुछ ब्लैक कमांडो निकले....और एक गाड़ी से एक सैनिक सैनिक ने पीछे का गेट खोला तो वो सज्जन पुरुष चुपचाप गाड़ी में जाकर बैठ गए...

लड़का ये सब देखकर हक्का बक्का था। उसने दौड़कर उनसे पूंछा----सर....सर आप कौन है??

वो सज्जन बोले---तुम जिस विक्रम साराभाई रिसर्च इंस्टीट्यूट में पढ़ते हो मैं वही विक्रम साराभाई हूँ .....

लड़के को 440 वाट का झटका लगा।

इसी भगवद गीता को पढ़कर डॉ अब्दुल कलाम ने आजीवन मांस न खाने की प्रतिज्ञा कर ली थी....

गीता एक महाविज्ञान है.....
गर्व कीजिये

Tuesday, 7 July 2020

बचें अशांति को मिटाने की चेष्टा से





"इस अशुद्धि से भरे संसार में कौन विश्रांति को उपलब्ध होता है?
 जो ठहर कर अशुद्धियों को बह जाने देता है।"

इस संबंध में बुद्ध की एक कहानी मुझे सदा प्रिय रही है, वह मैं आपसे कहूं। यह सूत्र उस पूरी कथा का शीर्षक है।
"हू कैन फाइंड रिपोज इन ए मडी वर्ल्ड? बाई लाइंग स्टिल इट बिकम्स क्लियर।'
बुद्ध एक पहाड़ के पास से गुजरते हैं। धूप है तेज। गर्मी के दिन। उन्हें प्यास लगी। आनंद से उन्होंने कहा, आनंद, तू पीछे लौट कर जा; अभी-अभी हमने एक नाला पार किया है, तू पानी भर ला!
आनंद भिक्षा-पात्र लेकर पीछे गया। कोई दो फर्लांग दूर वह नाला था। जब बुद्ध और आनंद वहां से निकले थे, तो नाला बड़ा स्वच्छ था। जलधार धूप में मोतियों जैसी चमकती थी। छिछला था नाला; कंकड़-पत्थरों पर शोर-गुल की आवाज करता बहता था। पहाड़ी नाला था; स्वच्छ, ताजा जल उसमें था। लेकिन जब आनंद वापस पहुंचा, तो देखा कि कुछ बैलगाड़ियां उसके सामने ही उसमें से गुजर रही हैं और नाला गंदा हो गया। धूल और कीचड़ ऊपर उठ आई। सूखे पत्ते दबे जो जमीन में पड़े थे, वे फैल गए। सारा पानी गंदा हो गया; पीने योग्य न रहा।
आनंद वापस लौटा। आनंद के मन में हुआ: बुद्ध इतने महा ज्ञानी हैं, उन्हें यह भी पता न चला कि जब मैं जाऊंगा, तो दो गाड़ियां वहां से निकल जाएंगी, सब पानी गंदा हो जाएगा! आनंद वापस लौटा और उसने बुद्ध से कहा कि वह पानी गंदा हो गया है। गाड़ियां उस पर से गुजर गईं। अब वह पीने योग्य नहीं है।
तो मैं आगे जाता हूं। तीन मील दूर आगे नदी है; वहां से पानी ले आऊं। बुद्ध ने कहा कि नहीं, पानी तो उसी नाले का मुझे पीना है। तू वापस जा! आनंद को बड़ी कठिनाई हुई कि पहले तो समझ लो कि न जानते हुए बुद्ध ने भेजा था; अब जान कर! आनंद को ठिठकते देख कर बुद्ध ने कहा, तू जा भी!
आनंद फिर गया। लेकिन उस पानी को पीने के योग्य माना नहीं जा सकता था। पानी बिलकुल गंदा था। आनंद बड़ी मुश्किल में पड़ा। उस गंदे पानी को बुद्ध के पीने के लिए लाए भी कैसे? फिर वापस लौटा; बुद्ध से कहा, क्षमा करें, वह पानी लाने योग्य बिलकुल नहीं है।
बुद्ध ने कहा, तू एक बार और मेरी मान और जा! आनंद का मन हुआ कि इनकार कर दे। लेकिन बुद्ध ने इतने अनुनय के स्वर से कहा कि वह फिर वापस लौटा। जाते वक्त बुद्ध ने उससे कहा, *आनंद, और अब लौटना मत। किनारे पर बैठ रहना। जब तक पानी तुझे पीने योग्य न लगे, तब तक बैठे रहना।*
आनंद गया। किनारे पर बैठ गया। बैठ कर देखता रहा, देखता रहा, देखता रहा। थोड़ी देर में सूखे पत्ते बह गए, मिट्टी के कण नीचे बैठ गए, धूल हट गई। पानी पुनः स्वच्छ हो गया। पानी भर कर आनंद नाचता हुआ लौटा।
बुद्ध के चरणों में गिर कर उसने कहा कि तुम्हारी अनुकंपा अपार है! क्या तुमने मुझे उस पानी की धार से कुछ संदेश दिया? मैं नासमझ क्या-क्या सोचता रहा!
मुझे समझ आ गया उस नदी के, उस झरने के किनारे बैठ कर कि यह मन भी ऐसा ही गंदगी से भरा है। क्या मन के किनारे भी हम ऐसे ही बैठ कर प्रतीक्षा करें, तो यह गंदगी बह जाएगी?
बुद्ध ने कहा, इसीलिए तुझे तीन बार मुझे वापस भेजना पड़ा।
लाओत्से का सूत्र उसका शीर्षक है। हू कैन फाइंड रिपोज इन ए मडी वर्ल्ड? *इस मटमैली, गंदी दुनिया में, कीचड़ से भरी दुनिया में, कौन पा सकेगा विश्रांति? बाई लाइंग स्टिल इट बिकम्स क्लियर।*
कुछ और करने की जरूरत नहीं है। इस संसार में प्रतीक्षा से शांत होकर बैठ जाना काफी है। सब स्वच्छ हो जाता है अपने से।
आनंद से बुद्ध ने बाद में पूछा कि आनंद, तुझे कभी ऐसा उस झरने के किनारे नहीं हुआ कि कूद पडूं और साफ कर दूं? आनंद ने कहा, हुआ ही नहीं, मैंने किया भी। लेकिन पानी और भी गंदा हो गया था।
मन के साथ हम भी सब यही करते हैं। कूद कर साफ करने की कोशिश करते हैं। जबर्दस्ती मन को साफ करने की कोशिश करते हैं। हमारी जबर्दस्ती, हमारा झरने में उतर जाना पानी को और गंदा कर जाता है।
इसलिए तथाकथित धार्मिक आदमी जो मंदिरों में बैठ कर ध्यान और पूजा और प्रार्थना करते रहते हैं, कहीं उनके मन में झांकने का आपको अवसर मिले, तो आपको पता चले कि वे मंदिर में जरूर बैठे हैं, मंदिर से उनके मन का कोई भी संबंध नहीं है।
मन उनका इतनी गंदगी से इतना भर गया है जितना कि दुकान पर बैठ कर भी नहीं भरता। क्योंकि दुकान पर भी एक एकाग्रता रहती है धन पर, मंदिर में उतनी एकाग्रता भी नहीं रह जाती। और क्यों नहीं रह जाती?
सभी को यह अनुभव हुआ होगा, जो भी मन को शांत करने की कोशिश करेगा, उसे पता चला होगा कि शांत करने जाओ, तो और अशांत हो जाता है।
क्योंकि शांत करने जाएगा कौन? आप अशांत हैं और आप शांत करने जा रहे हैं! तो अशांति दुगुनी हो जाएगी। बहुगुनी भी हो सकती है। तो अगर कोई बहुत ज्यादा शांत करने की कोशिश करे, तो पहले अशांत था, पीछे विक्षिप्त हो सकता है। फिर रास्ता क्या है?
लाओत्से का रास्ता खयाल में रखने जैसा है। यह परम मार्ग है। लाओत्से कहता है, मन की धारा के पास चुपचाप बैठ जाएं, लाइंग स्टिल, लेट जाएं। बहने दें धार को, होने दें गंदगी; मटमैली है धार, रहने दें। शांत बैठ जाएं, सिर्फ प्रतीक्षा करें। और कुछ न करें। कोशिश न करें शांत करने की।
कौन आदमी इस जगत में शांति को उपलब्ध हो सकता है? वही जो अशांति को मिटाने की चेष्टा से बचे।
यह बहुत अजीब लगेगा--जो अशांति को मिटाने की चेष्टा से बचे। क्योंकि सब अशांति हमारी चेष्टाओं का फल है। और अब हम शांत होने की भी चेष्टा करें, तो हम और गहन अशांति पैदा कर लेंगे।

ताओ उपनिषद--प्रवचन



बदला और बदलाव



#दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति बनने के बाद,
एक बार नेल्सन मंडेला अपने सुरक्षा कर्मियों के साथ एक होटल में खाना खाने गए। सबने अपनी अपनी पसंद का खाना आर्डर किया और खाना आने का इंतजार करने लगे। 

उसी समय मंडेला की सीट के सामने वाली सीट पर एक व्यक्ति अपने खाने का इंतजार कर रहा था। मंडेला ने अपने सुरक्षा कर्मी से कहा कि उसे भी अपनी टेबल पर बुला लो। ऐसा ही हुआ। सभी खाने लगे, वो आदमी भी अपना खाना खाने लगा, पर उसके हाथ खाते हुए कांप रहे थे।

खाना खत्म कर वो आदमी सिर झुका कर होटल से बाहर निकल गया। उस आदमी के जाने के बाद मंडेला के सुरक्षा अधिकारी ने मंडेला से कहा कि वो व्यक्ति शायद बहुत बीमार था, खाते वख़्त उसके हाथ लगातार कांप रहे थे और वह ख़ुद भी कांप रहा था। 

मंडेला ने कहा नहीं ऐसा नहीं है। वह उस जेल का जेलर था, जिसमें मुझे कैद रखा गया था। जब कभी मुझे यातनाएं दी जाती थीं  और मै कराहते हुए पानी मांगता था तो ये मेरे ऊपर पेशाब करता था।

मंडेला ने कहा मै अब राष्ट्रपति बन गया हूं, उसने समझा कि मै भी उसके साथ शायद वैसा ही व्यवहार करूंगा । पर मेरा चरित्र ऐसा नहीं है। मुझे लगता है बदले की भावना से काम करना विनाश की ओर ले जाता है। वहीं धैर्य और सहिष्णुता की मानसिकता हमें विकास की ओर ले जाती है। 

Monday, 6 July 2020

अमृत और जीवन



सिकंदर उस जल की तलाश में था, जिसे पीने से मानव अमर हो जाते हैं.!

काफी दिनों तक  दुनियाँ में भटकने के पश्चात आखिरकार उस ने वह जगह पा ही ली, जहाँ उसे अमृत की प्राप्ति हो

उसके सामने ही अमृत जल बह रहा था, वह अंजलि में अमृत को लेकर पीने के लिए झुका ही था कि तभी एक बूढ़ा व्यक्ति जो उस गुफा के भीतर बैठा था, जोर से बोला,  रुक जा, यह भूल मत करना...!’

बड़ी दुर्गति की अवस्था में था वह बूढ़ा !

सिकंदर ने कहा, ‘तू रोकने वाला कौन...?’

बूढ़े ने उत्तर दिया, ..मैं अमृत की तलाश में था और यह गुफा मुझे भी मिल गई थी !, मैंने यह अमृत पी लिया !
 अब मैं मर नहीं सकता, पर मैं अब मरना चाहता हूँ... !देख लो मेरी हालत...अंधा हो गया हूँ, पैर गल गए हैं,  

देखो...अब मैं चिल्ला रहा हूँ...चीख रहा हूँ...कि कोई मुझे मार डाले, लेकिन मुझे मारा भी नहीं जा सकता !
 अब प्रार्थना कर रहा हूँ  परमात्मा से कि प्रभु मुझे मौत दे !

 सिकंदर  चुपचाप गुफा से बाहर वापस लौट आया, बिना अमृत पिए !

 सिकंदर समझ चुका था कि जीवन का आनन्द
उस समय तक ही रहता है, जब तक हम उस आनन्द को भोगने की स्थिति में होते हैं!

इसलिए स्वास्थ्य की रक्षा कीजिये !
जितना जीवन मिला है,उस जीवन का भरपूर आनन्द लीजिये !
 हमेशा खुश रहिये

दुनियां में सिकंदर कोई नहीं, वक्त ही सिकंदर है..



जीवन अनमोल है ....कड़वा है किंतु यही सत्य है !

Lockdown में छूट सरकार ने दी है, कोरोना ने नही...
सरकार ने तो
लॉकडाउन खोल दिया
लेकिन आप सावधान रहिये, क्योंकि आप सरकार कि नजर में मात्र एक संख्या हैं
लेकिन अपने परिवार के लिये आप पूरी दुनिया हैं !
आपका जीवन अनमोल है !

Be Safe🙌

न्याय




मुल्ज़िम एक पंद्रह साल का लड़का था स्टोर से चोरी करता हुआ पकड़ा गया पकड़े जाने पर गार्ड की गिरफ्त से भागने की कोशिश में स्टोर का एक शेल्फ भी टूट गया
जज ने जुर्म सुना और लड़के से पूछा
तुमने क्या सचमुच कुछ चुराया था ब्रैड और पनीर का पैकेट लड़के ने नीचे नज़रें कर के जवाब दिया
क्यों ? 
मुझे ज़रूरत थी
खरीद लेते :-- जज
पैसे नहीं थे :-- लड़का 
घर वालों से ले लेते 
घर में सिर्फ मां है बीमार है बेरोज़गार भी उसी के लिए चुराई थी।
तुम कुछ काम नहीं करते ? 
करता था एक कार वाश में मां की देखभाल के लिए एक दिन की छुट्टी की थी तो मुझ निकाल दिया गया।
तुम किसी से मदद मांग लेते। 
सुबह से घर से निकला था तकरीबन पचास लोगों के पास गया बिल्कुल आख़री में ये क़दम उठाया।

जिरह ख़त्म हुई जज ने फैसला सुनाना शुरू किया :-

चोरी और ख़ुसूसन ब्रैड की चोरी बोहोत होल्नाक जुर्म है और इस जुर्म के हम सब ज़िम्मेदार हैं अदालत में मौजूद हर शख़्स मुझ समेत हम सब मुजरिम हैं इसलिए यहाँ मौजूद हर शख़्स पर दस-दस डालर का जुर्माना लगाया जाता है, दस डालर दिए बग़ैर कोई भी यंहा से बाहर नहीं निकल सकेगा।
ये कह कर जज ने दस डालर अपनी जेब से बाहर निकाल कर रख दिए और फिर पेन उठाया लिखना शुरू किया:-
इसके अलावा में स्टोर पर एक हज़ार डालर का जुर्माना करता हूं कि उसने एक भूखे बच्चे से ग़ैर इंसानी सुलूक करते हुए पुलिस के हवाले करा अगर चौबीस घंटे में जुर्माना जमा नहीं करा तो कोर्ट स्टोर सील करने का हुक्म दे देगी।
जुर्माना की पूर्ण राशि इस लड़के को देकर कोर्ट ने उस लड़के से माफी तलब करती है। 
फैसला सुनने के बाद कोर्ट में मौजूद लोगों के आंखों से आंसू तो बरस ही रहे थे उस लड़के के भी हिचकीया बंध गई।वो लड़का बार बार जज को देख रहा था जो अपने आंसू छिपाते हुए बाहर निकल गया।
ऐसे होते हैं ईमानदार जज।क्या हमारे देश में आज तक ऐसा कोई निर्णय दिया होगा।
हमारे देश में तो 20-20 और 25-25 वर्ष पश्चात जब कोई इन्सान बेकसूर सिद्ध होता है उसको उसको सिर्फ और सिर्फ माननीय न्यायालय बाइज्ज़त बरी कर देती है।

Sunday, 5 July 2020

#हमारे_कर्म_फल



 एक बार एक बिल्डर ने अपने मैनेजर को एक बार इतना डाटा कि मैनेजर को बहुत गुस्सा आया !
 पर बिल्डर को कुछ बोल ना सका...
 वह अपना गुस्सा किस पर निकाले ? गया सीधा अपने कंपनी स्टाफ के पास और सारा गुस्सा कर्मचारियों पर निकाल दिया।
अब कर्मचारी किस पर अपना गुस्सा निकाले ? तो जाते-जाते अपने गेट वॉचमैन पर उतारते गए !
अब वॉचमैन ने किस पर निकाला अपना गुस्सा ?
तो वह घर गया और अपनी बीवी को डांटने लगा बिना किसी बात पर। वह भी उठी और अपने बच्चे की पीठ पर 2 धमाक धमाक लगा दिया - सारा दिन tv देखता रहता है काम कुछ करता नहीं है !!
अब बच्चा घर से गुस्से से निकला, और  सड़क पर सो रहे कुत्ते को पत्थर दे मारा,
कुत्ता हड़बड़ाकर भागा और सोचने लगा कि इसका मैंने क्या बिगाड़ा-और गुस्से में उस कुत्ते ने एक आदमी को काट खाया-
और कुत्ते ने जिसे काटा...पता है वह आदमी कौन था ???
ये वही बिल्डर साहब थे,  जिन्होंने अपने मैनेजर को डांटा था...!!!

और वह बिल्डर जब तक जिए तब तक यही सोचता रहा कि उस कुत्ते ने आखिर मुझे क्यों काटा ?
लेकिन बीज किसने बोया ?

आया कुछ समझ में--  *कर्म के फल पीछा नहीं छोड़ते बाबा*  जाने अनजाने में कितने लोग हमारे व्यवहार से त्रस्त होते हैं,    परेशान होते हैं और कितने का तो नुकसान भी होता है।

पर हमें तो उसका अंदाजा भी नहीं होता, क्योंकि हम तो अपनी मस्ती में ही मस्त है।
पर  प्रकृति सब देखती है और उसका फल फिर किसी और के निमित्त से हमें मिलता है,  और हमें लगता है कि लोग हमें बेवजह ही परेशान कर रहे हैं*?
 🙏🌻

Wednesday, 20 May 2020

नेतृत्व


हैलो मित्रों
   अगर आप को महान नेता बनना है तो आपको उन लोगो की मदद करनी चाहिए जिनको किसी की मदद की जरूरत है। क्योंकि जब आप किसी की मदद करेंगे तो आपकी टीम धीरे धीरे और भी बड़ी हो जाएगी और आप एक महान लीडर के रूप में आगे आयेंगे।
   एक महान लीडर के अलग अलग चेहरे होते है। वो न केवल खुद को नेतृत्व देता है बल्कि उन सभी लोगो नेतृत्व करता है जो उसके आसपास है,  मुख्य समूहों और मुख्य संगठनों के लोगो का भी नेतृत्व करता है।