एक बार एक राजा के सैनिक एक चोर को पकड़ के राजा के दरबार में पहुचे ,और राजा से इनाम पाने की लालसा में चोर के कृत्य को बढ़ा-चढ़ा के बताने लगे । चोर सोच में पड़ गया कि मैंने तो छोटी सी चोरी की है, जिसकी सज़ा भी छोटी ही होनी चाहिए ।पर अगर ये सैनिक ऐसे ही बढ़ा-चढ़ा के बोलते रहे तो राजा मुझे बहुत बड़ी सज़ा दे देंगे । चोर अभी ये सब सोच ही रहा था कि तभी राजदरबार का समय समाप्त होने की घोषणा हुई और राजा ने चोर के भाग्य का फैसला अगले दिन करने की बात कहते हुए उसको जेलखाने में डालने का आदेश दे दिया ।
रात को जेलखाने में लेटे हुए चोर अपने बचाव की युक्ति सोचता रहा..... बहुत सोचने के बाद उसको अपने बचने की एक किरण नज़र आई ।
सुबह चोर को फिर से राजदरबार में राजा के सामने पेश किया गया । सैनिकों और अन्य गवाहों के नमक मिर्च युक्त बयानों को सुन कर राजा अत्यंत क्रोधित हुआ और उसने उस चोर को १०० कोड़े मारे जाने की सज़ा सुनाई । इस पर चोर ने सज़ा से पहले अपने मन की एक बात राजदरबार में कहने की अनुमति मांगी । राजा ने अनुमति दे दी ....
तब चोर ने कहा कि पिछली रात मैंने एक स्वप्न देखा जिसमे एक महात्मा जी मुझे एक जड़ी बूटी देते हैं और कहते हैं कि इसके सेवन से मुझे एक ऐसी शक्ति प्राप्त होगी जिससे कोई मेरा अहित नहीं कर पायेगा, मुझे मात्र वही व्यक्ति नुकसान पंहुचा पाएगा जो स्वयं पूर्ण रूप से पवित्र होगा... और जिसमे कोई बुराई न हो..... इतना कहकर चोर ने अपनी जेब से जड़ीबूटी का एक टुकड़ा निकाला और राजा को दिखाकर बोला कि यह वही जड़ीबूटी है जो स्वप्न के बाद मुझे जेलखाने में पड़ी मिली और इसका एक टुकड़ा मैं खा भी चुका हूँ !!
चोर के हाथ में पहले से ही कहीं से चुराई हुई जड़ीबूटी का आधा हिस्सा देखकर राजा को लगा कि चोर सच बोल रहा है.......और वो सोच में पड़ गया. ।
राजा को विचारमग्न देखकर चोर ने आगे कहा कि, मेरे इस स्वप्न का अर्थ यह हुआ कि मेरे द्वारा इस जड़ीबूटी का सेवन करने के बाद अब वही व्यक्ति मुझे कोड़े मार सकता है जो स्वयं पवित्र हो.. अर्थात जिसने स्वयं कभी चोरी न की हो ।
इतना सुनकर राजदरबार में ख़ामोशी छा गई और सभी एक दूसरे का मुंह देखने लगे !
कुछ देर बाद राजा ने अपने सिपहसालार से कहा कि तुम कोड़े मारना शुरू करो तो सिपहसालार बोला महाराज मैंने बचपन में अपने पिता जी की कुछ मुद्राएं चुराई थीं अतः मैं इसे कोड़े नहीं मार सकता...
फिर राजा ने अपने सेनापति से कोड़े मारने को कहा तो वो बोला महाराज मैंने भी बचपन में खेल खेल में कुछ अस्त्र चुराए थे अभ्यास के लिए, अतः मै भी इसे कोड़े नहीं मार सकता....
फिर राजा ने अपने मंत्री को आज्ञा दी कि वो चोर को कोड़े मारे..... पर मंत्री ने भी बचपन में कोई खिलौना चुराने की बात स्वीकारते हुए चोर को कोड़े मारने से इंकार कर दिया ।
इसके बाद राजा ने एक एक करके सभी दरबारियों और प्रजाजनों से चोर को कोड़े मारने के लिए कहा पर सभी ने कभी ना कभो कोई चोरी करने की बात स्वीकारते हुए कोड़े मारने से मन कर दिया ।
इस पर मंत्री ने राजा से कहा की महाराज अब तो आपको ही यह कार्य करना पड़ेगा.... आप ही इस चोर को १०० कोड़े मार कर इसे सज़ा दें........... मंत्री की यह बात सुनकर राजा सोच में पड़ गए और धीरे से मंत्री से बोले कि मैंने भी बचपन में एक बाग़ से आम चुराकर खाए थे अतः मैं भी इसे कोड़े नहीं मार सकता !!!
इतना सुनकर चोर ने बड़ी विनम्रता से हाथ जोड़कर राजा से कहा....... कि हे राजन जब इस दरबार में उपस्थित सभी गणमान्य एवं सुसंस्कृत व्यक्तियों ने चोरियां की हैं...... अर्थात सभी एक प्रकार से चोर हैं....... तो सज़ा सिर्फ मुझे ही क्यूँ ?
चोर के इस प्रश्न से सारे दरबार में एक सन्नाटा छा गया...........
...........................कथा-समाप्त.....................
हालांकि कहानी थोङी अटपटी लग सकती है लेकिन बात तो ठीक ही है,....... जब कोई दूध का धुला नहीं है ... तो सब एक दूसरे पर कीचड़ क्यूँ उछालते हैं.?
"सबने मन के आंगने, झूठ रखा संजोय,
मुझको झूठा वो कहे, जो खुद सांचा होय"